कुर्सी मिलते ही हम "आम हो गए" - सत्ता की कुर्सी मिलते ही बदलता रवैया

  कुर्सी 

एक कुर्सी क्या मिली "हम आम हो गए" 

चलते थे हमारी तरह वो भी सड़कों पर कभी,
अब तो सड़कों पर कदम रखे हुए, कई शाम हो गए 
एक कुर्सी क्या मिली "हम तो आम हो गए" 

लड़ते थे वो भी हमारी तरह सभी के हकों के लिए, 
अब तो अधिकार और हक़ उनके लिए, गुमनाम हो गए 
एक कुर्सी क्या मिली "हम तो आम हो गए" 


पीड़ा उन्हें भी होती थी दूसरों के दर्द से कभी, 
अब इन शब्दों से भी वो, अनजान हो गए 
एक कुर्सी क्या मिली "हम तो आम हो गए" 


गुजरे थे जिन -जिन गलियों से वो कभी, 
अब तो उन गलियों से गुजरे हुए, कई साल हो गए 
एक कुर्सी क्या मिली "हम तो आम हो गए" 


होते थे, क़ायदे , उसूल  जिनके लिए बहुत ही अहम, 
अब वो सभी , श्मशान हो गए 
एक कुर्सी क्या मिली "हम तो आम हो गए"   








Comments

  1. Wow nikhat! Really nice and apt!

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  2. Beautiful! Thank you for writing this. This has such a deep meaning.

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